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बीर भड़ माधो सिंह भंडारी

 “एक सिंह रैंदो बण, एक सिंह गाय का एक सिंह माधो सिंह, और सिंह काय का” उत्तराखंड में प्रसिद्ध इस लोकोक्ति का अर्थ है- एक सिंह वन में रहता है, एक सींग गाय का होता है। एक सिंह माधो सिंह है, इसके अलावा बाकी सिंह बेकार हैं। उत्तराखंड की लोक गाथाओं में कई ‘वीर भड़ों’ (वीर योद्धा) का ज़िक्र है। और इन्ही में से एक वीर भड़ हैं माधो सिंह भण्डारी। माधो सिंह भण्डारी का जन्म मलेथा गाँव में हुआ था जो उत्तराखंड के बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर देवप्रयाग और श्रीनगर के बीच में बसा हुआ है। पहाड़ की लोक गाथाओं में वीर गढ़वाली योद्धा माधो सिंह भण्डारी का अपना अलग विशेष स्थान है। लगभग 400 साल पहले पहाड़ का सीना चीरकर नदी का पानी ‘कूल’ (सुरंग) बनाकर अपने गाँव मलेथा तक लेकर आने का काम महान योद्धा माधो सिंह भण्डारी ने किया था। माधो सिंह द्वारा बनाई गई ‘कूल’ के जरिए जो पानी आता है, उससे मलेथा गाँव के खेतों में आज भी हरियाली है। ‘माधो सिंह मलेथा’ माधो सिंह भण्डारी का जन्म सन 1595 के लगभग उत्तराखंड के टिहरी जिले के मलेथा गाँव में हुआ था। जिस कारण उन्हें ‘माधो सिंह मलेथा’ भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम ‘सोण...

कोटेस्वर महादेव

हिन्दू बिवाह रात्रि मैं क्यूँ होते हैं

क्या कभी आपने सोचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि ये निशाचरी समय होता है ? रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रवृति बताया जाता है। रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं। केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्रि में हवन व यज्ञ की अनुमति है। वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे हैं। तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पड़ी ? कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं  या  स्वयं इस प्रश्न का हल क्यों नहीं खोजते हैं ? दरअसल भारत में सभी उत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे चूंकि ये सनातनी परम्परा है। सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था। शिव विवाह से लेकर संयोगिता स्वयंवर (बाद में पृथ्वीराज चौहान जी द्वारा संयोगिता जी की इच्छा से उनका अपहरण) आदि सभी शुभ कार्यक्रम दिन में ही होते थे। प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही ...

राजुला मालुशाई

 *राजुला- मालुशाही* अपने उत्तराखंड की एक प्रेमगाथा प्रसिद्ध है, यह करीब एक हजार साल पुरानी है। कत्यूरी राज का अन्तिम दौर चल रहा था। राजधानी कार्तिकेय पुर (बागेश्वर) से द्वारहाट (बैराठ) आ चुकी थी। एक रात को कत्यूरी वंश के राजा मालूशाही के स्वप्न में जोहार के सुनपति शौका की बेटी राजुला आ गई। मालूशाही की सात रानियाँ पहले से थीँ, लेकिन राजुला का अप्रतिम सौन्दर्य देखकर वह राजुला पर मोहित हो गया। वह राजुला को प्राप्त करने के लिए मल्ला जोहार के दुर्गम रास्ते पर दल बल के साथ चल पड़ा। कहा जाता है कि मालूशाही भी राजुला के स्वप्न में आया और वह भी उस से प्रेम करने लगी, उसने मन ही मन मालुशाही को अपना मान लिया। राजुला के पिता ने उसकी  उसकी शादी हूणदेश (तिब्बत) के एक व्यापारी से तय कर दी। मालूशाही अपने लाव-लश्कर के साथ जोगी के वेश में शौक्आन पहुँचा,मालू की यह यात्रा बहुत कठिन थी। मालू किसी तरह राजुला से मिला और उसके मन की बात पूछी, राजुला ने अपने मन की बात बता दी, तब मालुशाही ने राजुला के पिता से उसका हाथ मांगा पर उसने मना कर दिया।एक षडयंत्र कर मालूशाही को ज़हर खिला दिया गया । सिदुवा और विदुव...

उत्तराखंड दिवस

 9नवम्बर को उत्तराखंड दिवस मनाया जाता हैं, इन 20 सालों मैं जो सपने आम लोगों ने देखें थे वो अभी भी कोसों दुर हैं, उत्तराखंड के लिये लोगों ने अपनी जाने तक दी हैं  जिसका निर्माण 9 नवम्बर    2000 को कई बर्षो   के पश्चात   भारत  गणराज्य के 27वे राज्य  के रूप में किया गया था। सन 2000 से 2006 तक यह उत्तराञ्चल के नाम से जाना जाता था। जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया।   राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिबत  और पूर्व में नेपाल   से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल  और दक्षिण में उत्तर प्रदेश  इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक  हिन्दू ग्रन्थों  और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है।  हिन्दी  और  संस्कृत  में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों  ग...

Chef ) बावर्ची

 मैं  (chef ) होने के वास्ते आपको बताना चाहूंगा  International Chef Day।।। अंतर्राष्ट्रीय बावर्ची दिवस 2020  नमस्ते दोस्तो आपका स्वागत है  आज हम आपको इंटरनेशनल शेफ डे के बारे में बताने वाला  हुँ इस साल इंटरनेशनल सेफ डे  20 अक्टूबर को आया है। शेफ की अहमियत हमारी जिंदगी में बहुत बड़ी होती है क्योंकि बिना शेफ के हमे अच्छा खाना खाने को नही मिलता है। आपको हम यह भी बताना चाहते हैं कि शेफ से बढ़िया खाना आज के जमाने मे कोई नही बना सकता है। आज का मेरा  यह आर्टीकल विशेष तौर पर इसलिए बनाया गया है कि इंटरनेशल शेफ डे क्यों मनाया जाता है और आप सभी इस दिन को कैसे मना सकते हैं। आपको बता दें कि हम पूरे साल में कई बार अलग अलग शेफ के हाथ का बना खाना खाते हैं लेकिन हममें से कुछ ही लोग होते हैं जो कि उनकी हाथो की तारीफ करते हैं। आपको बता दें कि यह दिन ऐसे अच्छे खाना बनाने वालो के नाम दिया जाता है। अगर आपको भी किसी के हाथ का खाना पसंद है तो आप भी उन्हें हैप्पी इंटरनेशनल शेफ डे विश कर सकते है। अच्छा खाना हरकोई नहीं बना पता जो दिल से मेहनत करता है ये कला उसी का नाम  र...

वो स्कुल के दिन

 वो सर्दी की गुनगुनी धूप शर्दी  के लाजवाब दिन, सुबह सुबह दाल भात खा कर  स्कूली दिन, नीली कमीज और  भूरी पैंट, वो मटमैला सा गले में टांगने  वाला बस्ता जो "गिला " रेहता  दवात की स्याही से, स्कूल जाना एक कौतिक ही था तब, एक दो रूपये में भरपूर चाय और "बन"   नारंगी टॉफियों  से जेबें भर जाया करती थी ,वो  गुरूजी  का सख्त रूख और बेंत की मार बहुत - बहुत चुभती थी आज न जाने क्यों शकून का अहसास कराती है , हमारा स्कूल बहुत दूर हुआ करता था, लगभग गांव से 10किलोमीटर की दुरी पर सुबह 5 बजे उठना पड़ता था, और मैं सबसे पहले स्कूल जाने के लिए तैयार होता था, बाकी सहपाठी मेरे बाद ही आये करते थे, क्यूंकि मेरा घर गांव से सबसे ऊपर था आना जाना 2, 3 घंटे लग ही जाते थे, कभी कभी हम नागरिक शास्त्र के बिषय का काम नहीं कर पाते थे तो नागरिक शास्त्र बिषय के गुरूजी इतने खतरनाक थे की उनका खौफ के कारण हम कभी कभी रास्ते मैं जंगल पड़ता था वहीँ घूमने चले जाते थे, जंगल होने के कारण वहां "चारा पती"लकड़ियों के लिए महिलाएं आया करती थी, महिलाएं अपने समूह मैं "स्थानीय भाषा मैं, गीत गा...