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द्रोणागिरी गाँव

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यह स्थान है उत्तराखंड स्थित द्रोणागिरि गांव। द्रोणागिरी गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ विकास खण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है. यह गांव लगभग १४००० फुट की ऊंचाई पर स्थित है. यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था. चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वह हनुमान जी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए. यही कारण है कि आज भी यहां हनुमान जी की पूजा नहीं होती. यहां तक कि इस गांव में"लाल रंग" का "झंडा"लगाने पर पाबंदी है. द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान जी बूटी लेने के लिए इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है. तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी. उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया. हनुमान उड़कर पर्वत पर गए पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके. वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे. जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्व...

हनुमान चट्टी

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हनुमान चट्टी एक मंदिर है, जो भगवान हनुमान को समर्पित है। यह ऋषिकेश, उत्तराखंड से लगभग 286 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर के जोशीमट से 34 किलोमीटर की दूरी पर हैं और बद्रीनाथ मंदिर लगभग 12 कि.मी. तथा दोनों के बीच में स्थित है। गढ़वाल हिमालय में हनुमान चट्टी के एक ही नाम से दो स्थान हैं। एक मंदिर यमुनोत्री धाम पर स्थित है, जबकि दूसरा बद्रीनाथ मंदिर तक है। हालांकि मंदिर कद में छोटा दिखता है लेकिन यह बहुत सुंदर है और इसके पीछे एक प्रभावशाली इतिहास है। किंवदंती यह है कि यह इस स्थान पर था कि भगवान हनुमान ने पांडव भाई भीम को गले लगाया था और उनके अहंकार को कुचल दिया था। मंदिर के पीछे की कहानी भीम अपनी ताकत और शक्ति के लिए प्रसिद्ध पांडव भाइयों में से एक थे। एक दिन जब भीम इस रास्ते से गुजर रहे थे, तो उन्हें रास्ते में एक बुढें बंदर का सामना करना पड़ा। भीम के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने के कारण उनकी पूंछ फैल हुई थी। भीम ने पूंछ हटाने के लिए बुढें बंदर से कई बार अनुरोध किया, लेकिन बंदर ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह बहुत बूढ़ा है और वह बहुत थका हुआ है। भीम इस कारण क्रोधित हो गए और म...

रति.....

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रत्ती """"" यह शब्द लगभग हर जगह सुनने को मिलता है। जैसे - 'रत्ती भर भी परवाह नहीं, रत्ती भर भी शर्म नहीं', रत्ती भर भी अक्ल नहीं... आपने भी इस शब्द को बोला होगा, बहुत लोगों से सुना भी होगा। आज जानते हैं 'रत्ती' की वास्तविकता, यह आम बोलचाल में आया कैसे. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रत्ती एक प्रकार का पौधा होता है, जो प्रायः पहाड़ों पर पाया जाता है। इसके मटर जैसी फली में लाल-काले रंग के दाने (बीज) होते हैं, जिन्हें रत्ती कहा जाता है। प्राचीन काल में जब मापने का कोई सही पैमाना नहीं था तब सोना, जेवरात का वजन मापने के लिए इसी रत्ती के दाने का इस्तेमाल किया जाता था. सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस फली की आयु कितनी भी क्यों न हो, लेकिन इसके अंदर स्थापित बीजों का वजन एक समान ही 121.5 मिलीग्राम (एक ग्राम का लगभग 8वां भाग) होता है। तात्पर्य यह कि वजन में जरा सा एवं एक समान होने के विशिष्ट गुण की वजह से... कुछ मापने के लिए जैसे रत्ती प्रयोग में लाते हैं। उसी तरह किसी के जरा सा गुण, स्वभाव, कर्म मापने का एक स्थापित पैमाना बन गया यह "रत्ती" शब्द...

धारी देवी

 जय माँ धारी देवी 🌹 कहते हैं कि धारी देवी सात भाइयों की इकलौती बहन थी, बचपन में ही माता पिता के देहांत के बाद सातों भाइयों ने धारी देवी की देखरेख की वह भी अपने भाइयों की खूब सेवा करती थी तभी भाइयों को पता चला कि उनकी बहन के ग्रह भाइयों के खराब हैं तो ओ बहन से नफ़रत करने लगे,जब वह कन्या तेरह साल की थी तो उसके पांच भाइयों की मृत्यु हो गई बचे हुए दो भाइयों को लगा कि इसी बहन के ग्रहों के कारण भाइयों की मृत्यु हो गई है, फिर उन्होंने रात्रि के समय में कन्या की हत्या कर दी और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया सिर और धड़ को गंगा में बहा दिया, कन्या का सिर बहते हुए दूर धारी गांव में पहुंच गया, प्रातः काल में नदी किनारे एक व्यक्ति कपड़े धो रहा था उसे लगा कि एक कन्या डूब रही है बचाने का प्रयास किया परंतु पानी बहुत था इसलिए पीछे हटा तभी उस सिर में से आवाज आई कि डर मत मुझे बचा तू जहां जहां पैर रखेगा वहां पर सीढ़ियां बनती जायेंगी,उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया और सीढ़ियां बनती गई, जैसे ही उसने कन्या समझकर सिर को उठाया तो कटा सिर देखकर घबरा गया फिर सिर पर से आवाज आई कि मैं देवी रूप में हूं तू मुझे किसी पवि...

पंच प्रयाग

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उत्तराखंड देवभूमि है। यहां पंच प्रयाग में दर्शन से जीवन में उल्लास आता है। ये प्रमुख पंच प्रयाग हैं- विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग। यह पंच प्रयाग उत्तराखंड की मुख्य नदियों के संगम पर हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नदियों का संगम बहुत ही पवित्र माना जाता है। इन पंच प्रयागों का पवित्र जल एक साथ अलकनंदा और भगीरथी का जल भगवान श्रीराम की तपस्थली देवप्रयाग में मिलता है और यहीं से भगीरथी और अलकनंदा का संगम गंगा के रूप में अवतरित होता है   उत्तराखंड के हिमालय के क्षेत्र के पंच प्रयाग यानी संगम को सबसे पवित्र माना गया है, क्योंकि गंगा, यमुना सरस्वती और उनकी सहायक नदियों का उत्तराखंड देवभूमि उद्गम स्थल है। जिन जगहों पर इनका संगम होता है उन्हें प्रमुख तीर्थ माना जाता है। जिनमें स्नान का विशेष महत्व है और इन्हीं संगम स्थलों पर पूर्वजों के मोक्ष के लिए श्राद्ध तर्पण भी किया जाता है। 🚩विष्णुप्रयाग बद्रीनाथ से होकर निकलने वाली विष्णु प्रिया अलकनंदा नदी और धौली गंगा नदी का जोशीमठ के नजदीक जिस स्थान ...

मेरा अनुरोध है आप सभी से इस पोस्ट को एक बार जरूर पढ़ें

मेरी यह पोस्ट उन बहन बेटियों के लिए है जो अपने गुरुर में अपने अहंकार में अपने पति का घर छोड़ देती हैं और अपने पतियों को कम कमाई के ताने देती है उन हर बहन बेटियों से मेरा अनुरोध है जिनकी शादी हो गई और जिनकी शादी होने वाली है वह इस पोस्ट को एक बार जरूर पढ़ें बेटियों आप जिस घर में शादी करके जाते हो जरूरी नहीं कि वह आपके घर जैसा ही हो हर घर में हर पति की इतनी कमाई नहीं रहती जितनी आपने आपके घर में पापा और भाई की देखी है आपको जो सुख सुविधा आपके मम्मी पापा के घर मिली यह जरूरी नहीं कि आप को पति के घर में भी मिले आज मैं सुबह उठा था ही और पास वाले चौहान जी दिख गए मैं बोला चौहान जी नमस्कार चौहान जी बोले कुंवर जी नमस्कार मैं फिर बोला चौहान जी आप कुछ उदास दिख रहे हो क्या बात है शर्मा जी उदास होकर बोले कि मेरी बेटी घर पर आकर बैठ गई मैं बोला चौहान जी बेटी तो "संग्रान्द " पर आई हुई थी ना तो इसमें कौन सी बड़ी बात है चौहान बोले नहीं कुंवर जी बेटी हमेशा के लिए अपने पति को छोड़ कर आ गई और बोलती है मुझे तलाक दिलवाओ पापा मैंने फिर चौहान जी से पूछा आपने आपकी बेटी से पूछा पति के यहां क्या समस्या है ...

रोचक जानकारी

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☺ कर लो दर्शन ☺ बाबा अमरनाथ से जुड़ी अमर कबूतर की कथा पुराणों में वर्णित है कि एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, आप अजर-अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर फिर से वर्षों की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यों? और आपके कंठ में पड़ी यह नरमुण्ड माला तथा आपके अमर होने का रहस्य क्या है? भोलेनाथ ने बताया कि हे शक्ति ये नरमुंड तुम्हारे ही हैं !!! भगवान शंकर ने माता पार्वती से एकांत और गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा जिससे कि अमर कथा कोई अन्य जीव न सुन पाए। क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता है, वह अमर हो जाता। पुराणों के मुताबिक, शिव ने पार्वती को इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में अपनी साधना की अमर कथा सुनाई थी, जिसे हम अमरत्व कहते हैं। कहते हैं भगवान भोलेनाथ ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, जटाओं से चंद्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगाजी को पंचतरणी में तथा कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया। इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। अगला पड़ाव गणेश पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ द...

सती अनुसूया

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#जब_सती_अनुसूया_के_तप_से_त्रिदेव_बन_गए_शिशु अत्रि ऋषि की पत्नी और सती अनुसूया की कथा से अधिकांश लोग परिचित हैं।  एक बार नारदजी विचरण कर रहे थे तव तीनों देवियां मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को परस्पर विमर्श करते देखा। तीनों देवियां अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा कर रही थी। नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया। नारद जी बोले उनके समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। तीनों देवियों को मन में अनुसूया के प्रति ईर्ष्या होने लगी। तीनों देवियों ने सती अनसूया के पातिव्रत्य को खंडित के लिए अपने पतियों को कहा तीनों ने उन्हें बहुत समझाया पर पर वे राजी नहीं हुई।     इस विशेष आग्रह पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनसूया के सतित्व और ब्रह्मशक्ति परखने की सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने यतियों का भेष धारण किया और अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे तथा भिक्षा मांगने लगे।  अतिथि-सत्कार की परंपरा के चलते सती अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का...

केदारनाथ

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केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, 🙏 दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी।😲😲  एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता, मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता चलते चलते उसको महीनो बीत गए, आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया।   केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।   पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है, और सभी जन वहा से चले गये वह वही प...

पृथ्वीराज चौहान

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पुरा नाम :-          पृथ्वीराज चौहान  अन्य नाम :-         राय पिथौरा  माता/पिता :-       राजा सोमेश्वर चौहान/कमलादेवी पत्नी :-               संयोगिता जन्म :-               1149 ई.   राज्याभिषेक :-     1169 ई.    मृत्यु :-                1192 ई.  राजधानी :-          दिल्ली, अजमेर वंश :-                 चौहान (राजपूत) आज की पिढी इनकी वीर गाथाओ के बारे मे..  बहुत कम जानती है..!!  तो आइए जानते है..  #RajputSamratPrithvirajChauhan से जुडा इतिहास एवं रोचक तथ्य,,, ''(1)  प्रथ्वीराज चौहान ने 12 वर्ष कि उम्र मे बिना किसी हथियार के खुंखार जंगली शेर का जबड़ा फाड़  ड़ाला था । (2) पृथ्वीराज चौहान ने 16 वर्ष की आयु मे ही  महाबली नाहरराय को युद्ध मे हराकर माड़वकर पर व...

त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड

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#क्या आप जानते हैं कि इसी पृथ्वी पर विद्यमान है वह जगह जहां साक्षात #भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।अधिक जानकारी के लिए आगे पढ़ें........... 👉उत्तराखंड का #त्रियुगीनारायण मंदिर ही वह पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है। इस मंदिर के अंदर सदियों से अग्नि जल रही है। शिव-पार्वती जी ने इसी पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया था। यह स्थान रुद्रप्रयाग जिले का एक भाग है।👇 👉 #त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में ही कहा जाता है कि यह भगवान शिव जी और माता पार्वती का शुभ विवाह स्थल है।👇 👉मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि क ई युगों से जल रही है इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युगों से जल रही है। 👉त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिव पार्वती के विवाह में विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था। जबकि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित बने थे। 👉उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रहम शिला कहा जाता है जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है। 👉वि...

धारी देवी

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#माँ_धारी_देवी 🙏🙏 #पहाड़ों और #तीर्थ_यात्रियों की #रक्षक -: बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर कलियासौड़ में अलकनन्दा नदी के किनारे सिद्धपीठ माँ धारी देवी का मंदिर स्थित है। माँ धारी देवी प्राचीन काल से उत्तराखण्ड की रक्षा करती है, सभी तीर्थ स्थानों की रक्षा करती है।   माँ धारी देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है वर्ष 1807 से इसके यहां होने का साक्ष्य मौजूद है, पुजारियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर इससे भी पुराना है, 1807 से पहले के साक्ष्य गंगा में आई बाढ़ में नष्ट हो गए हैं 1803 से 1814 तक गोरखा सेनापतियों द्वारा मंदिर को किए गए दान अभी भी मौजूद है, बताया जाता है कि ज्योतिलिंग की स्थापना के लिए जोशीमठ जाते समय आदि शंकराचार्य ने श्रीनगर में रात्रि विश्राम किया था इस दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने धारी माँ की आराधना की थी, जिससे वे ठीक हो गए थे तभी उन्होंने धारी माँ की स्तुति की थी ।   इस मंदिर में पूजा अर्चना धारी गांव के पंडित कराते हैं  यहां के तीन पंडित भाई (परिवार) चार -चार महीने पूजा कराते हैं, यहां के पुजार...

ओली उत्तराखंड

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औली, उत्तराखंड में स्थित एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां देश और विदेश से टूरिस्ट आते हैं. यह हिल स्टेशन बद्रीनाथ के रास्ते में स्थित है.दिल्ली से 504 किमी दूर है उत्तराखंड का खूबसूरत हिल स्टेशन औली, इसे कहते हैं भारत का मिनी स्विट्जरलैंडAuli Hill Station Uttarakhand: औली, उत्तराखंड में स्थित एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां देश और विदेश से टूरिस्ट आते हैं. यह हिल स्टेशन बद्रीनाथ के रास्ते में स्थित है. यहां एशिया की सबसे लंबी केबल कार है जो कि 4 किमी लंबी है. इस केबल कार में बैठकर पर्यटक औली के अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हैं और बर्फ से ढकी चोटियों के दृश्य देखते हैं.देवदार और चीड़ के वृक्ष,सेब के बाग इस हिल स्टेशन की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. दिल्ली से औली की दूरी करीब 504 किलोमीटर है. नैसृगिक प्राकृतिक खूबसूरती के कारण औली हिल स्टेशन को भारत का 'मिनी स्विट्जरलैंड' भी कहते हैं. गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले में स्थित यह हिल स्टेशन सुमद्र तल से 3,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां से टूरिस्ट कई पर्वत श्रृंखलाओं को देख सकते हैं. औली से पर्यटक नंदा देवी पर्व...

केदारनाथ की अनसुलझी बातें

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केदारनाथ मंदिर एक अनसुलझी पहेली  है I केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था इसके बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। पांडवों से लेकर आदि शंकराचार्य तक। आज का विज्ञान बताता है कि केदारनाथ मंदिर शायद 8वीं शताब्दी में बना था। यदि आप ना भी कहते हैं, तो भी यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अस्तित्व में है। केदारनाथ की भूमि 21वीं सदी में भी बहुत प्रतिकूल है। एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ पहाड़ी, दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है। इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इनमें से कुछ इस पुराण में लिखे गए हैं। यह क्षेत्र "मंदाकिनी नदी" का एकमात्र जलसंग्रहण क्षेत्र है। यह मंदिर एक कलाकृति है I कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर कलाकृति जैसा मन्दिर बनाना जहां ठंड के दिन भारी मात्रा में बर्फ हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी बहता हो। आज भी आप गाड़ी से उस स्थान तक नही जा सकते I फिर इस मन्दिर को ऐसी जगह क्यों बनाया गया? ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा...

देवप्रयाग

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उत्तराखंड के सभी शहरों का स्वयं का एक इतिहास है, इसी क्रम में देवप्रयाग शहर का भी अपना एक अलग और अनोखा इतिहास है। यह शहर पंडितों का स्थान है और ये पंडित बद्रीनाथ धाम से संबंधित होते हैं । देवप्रयाग में गंगोत्री से आने वाली भागीरथी नदी एवं बदरीनाथ धाम से आने वाली अलकनंदा नदी का संगम होता है और देवप्रयाग से यह नदी पवित्र गंगा के नाम से जानी जाती है| अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर स्थित यह शहर 472 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह नगर ऋषिकेश बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर स्थित देवप्रयाग तहसील का मुख्यालय है| मान्यतानुसार अलकनंदा नदी के पांच पवित्र संगम तीर्थों में एक देवप्रयाग को ऋषि देव शर्मा के नाम से भी जाना जाता है जिन्होने यहाँ तपस्या करके भगवान के दर्शन किये थे| इस नगर की अलौकिक एवं दैवीय सुन्दरता कई धार्मिक पर्यटकों को आकर्षित करती है| ये भी माना गया है की यहाँ भगवान् राम एवं राजा दशरथ ने तप किया था | अपने मन में भक्ति एवं विश्वास ले कर आये हुए पर्यटकों के दर्शनार्थ यहाँ रघुनाथ जी का दस हज़ार साल पुराना मंदिर स्थित है | संगम से ऊपर पुराने पत्थरों से बने इस मंदिर में एक अनियमित पिरामिड...

टिहरी गढ़वाल का अशोक राजा कीर्ति शाह

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  टिहरी राजवंश में कीर्ति शाह सबसे महत्वपूर्ण राजाओं में थे. कीर्ति शाह ने राज्य  को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया. कीर्ति शाह को टिहरी का अशोक भी कहा गया. टिहरी रियासत के राजा कीर्ति शाह का शासन लोक हितों को प्राथमिकता देने वाला एसा शासन था. (King Kirti Shah Tehri Dynasty) 1892 में आगरा में उत्तर भारत के देशी रियासतों के एक सम्मेलन में गवर्नर लॉर्ड लैंसडाउन ने अन्य रियासतों के शासकों से कीर्ति शाह को आर्दश बनाने की बात करते हुये कहा- यह बड़े सौभाग्य की बात होगी कि भारत के नरेश गढ़वाल के राजा महाराजा कीर्ति शाह को अपना आदर्श बनाएं, उनके सदृश्य योग्यता प्राप्त करने का कार्य करें. इस कथन का अभिप्राय यह है कि 1892 में टिहरी रियासत लोक प्रशासन के सामान्य उद्देश्य को पूरा कर रही थी. ब्रिटिश शासन का यह आश्चर्यजनक विरोधाभास दिखाई देता है कि जहां वह एक ओर भारत के प्राकृतिक संसाधनों का व्यवसायिक दोहन करना चाहते थे वहीं वह जानते थे कि इस दोहन प्रक्रिया को लंबा चलाने के लिए उन्हें लोक प्रशासन, लोक हितैषी बनाए रखना होगा ताकि विरोध के स्वरों को रोका जा सके. इसी उद्देश्य से ब्रिटिश शासन ने जगह-...

History of garhwal surnames Brahmin

 History of some Garhwali Brahmin Surnames मूल रूप से गढ़वाल में ब्राह्मण जातियां तीन हिस्सो में बांटी गई है :- 1 सरोला  2 गंगाड़ी  3 नाना  सरला और गंगाड़ी 8 वीं और 9वीं शताब्दी के दौरान मैदानी भाग से उत्तराखंड आए थे। पवार शासक के राजपुरोहित के रूप में सरोला आये थे।  गढ़वाल में आने के बाद सरोला और गंगाड़ी लोगो ने नाना गोत्र के ब्राह्मणों से शादी की। सरोला ब्राह्मण के द्वारा बनाया गया भोजन सब लोग खा लेते है परंतु गंगाड़ी जाती का अधिकार केवल अपने सगे-सम्बन्धियो तक ही सिमित है।    1. नौटियाल - 700 साल पहले टिहेरी से आकर तली चांदपुर में नौटी गाव में आकर बस गए !    आप के आदि पुरष है नीलकंठ और देविदया, जो गौर ब्राहमण है।। नौटियाल चांदपुर गढ़ी के राजा कनकपाल के साथ सम्वत 945 मै धर मालवा से आकर यहाँ बसी, इनके बसने के स्थान का नाम गोदी था जो बाद मैं नौटी नाम मैं परिवर्तित हो गया और यही से ये जाती नौटियाल नाम से प्रसिद हुई। 2. डोभाल -  गढ़वाली ब्राह्मणों की प्रमुख शाखा गंगाडी ब्राह्मणों मैं डोभाल जाती सम्वत 945 मै संतोली कर्नाटक से आई मूलतः कान्य...

जीवन का कठोर सत्य

 जीवन का कठोर सत्य भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की द्रष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे। गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद बापिस कैलाश पर आ गया। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था। यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जलदी इतनी दू...

"जनरल बकरा बैजू"

 जनरल बकरा बैजू' लम्बी दाढ़ी, विशाल बलिष्ठ शरीर, ना कभी कोई हथियार उठाया और ना कभी कोई जंग लड़ी फिर भी वो गढ़वाल राइफल्स का सबसे सम्मानित जनरल रहा. ये बात आपको और हैरत में डाल देगी कि वो इंसान नहीं, एक जानवर था. एक बकरा था. जो आज भी 'जनरल बकरा बैजू' 🙏🏼🇮🇳के नाम से प्रसिद्ध है. सुनने में शायद ये किस्सा आपको कितना अटपटा लगे लेकिन हकिकत में ये उतना ही रोचक और रोमांचक है. चलिए जानते है कहानी..कैसे एक बकरे का एहसान चुकाने के लिए सेना ने उसे जनरल का दर्जा दिया और सैनिक बैरक में एक कमरा भी. यह कहानी 1919 के तीसरे एंग्लो-अफगान लड़ाई की है. अफगानिस्तान ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा छेड़ दिया था. इस विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश भारतीय सेना को भेजा गया था, जिसका एक हिस्सा गढ़वाल रेजीमेंट भी था. प्रथम विश्व युद्ध का समय था. गढ़वाल रायफल्स की एक टुकड़ी को अफगानिस्तान में विद्रोह दबाने को भेजा गया इससे पहले ब्रिटिश सेना के 1700 सिपाही मारे गये थे. अब बारी थी गढ़वाल रायफल्स के सैनिकों के शौर्य की. अफगानिस्तान के चित्राल के आस-पास सेना भटक गयी और दिनों तक भूखे रह गयी. एक रात भूख ...

उत्तराखंड मैं इगास का इतिहास

 इगास का इतिहास - गढ़वाल में इसलिए मनाई जाती है "इगास" दिवाली ........ माधो सिंह भंडारी की वीरता से है इसका संबंध .............        माधो सिंह भंडारी 17 वीं शताब्दी में गढ़वाल के प्रसिद्ध भड़ (योद्धा) हुए। माधो सिंह मलेथा गांव के थे। तब श्रीनगर गढ़वाल के राजाओं की राजधानी थी।        माधो सिंह भड़ परंपरा से थे। उनके पिता कालो भंडारी की बहुत ख्याति हुई। माधो सिंह, पहले राजा महीपत शाह, फ़िर रानी कर्णावती और फिर पृथ्वीपति शाह के वजीर और वर्षों तक सेनानायक भी रहे। एक गढ़वाली लोकगाथा गीत (पंवाड़ा) देखिए -  "सै़णा सिरीनगर रैंदू राजा महीपत शाही  महीपत शाह राजान भंडारी सिरीनगर बुलायो ...."        तब गढ़वाल और तिब्बत के बीच अक्सर युद्ध हुआ करते थे। दापा के सरदार गर्मियों में दर्रों से उतरकर गढ़वाल के ऊपरी भाग में लूटपाट करते थे। माधो सिंह भंडारी ने तिब्बत के सरदारों से दो या तीन युद्ध लड़े। सीमाओं का निर्धारण किया। सीमा पर भंडारी के बनवाए कुछ मुनारे (स्तंभ) आज भी चीन सीमा पर मौजूद हैं। माधो सिंह ने पश्चिमी सीमा पर हिमाचल...